जाने गुरु पूर्णिमा का महत्व और इसका इतिहास

भारतीय संस्कृति विशेषकर हिन्दुओं में गुरुओं को ईश्वर के बरारबर माना जाता है। एक अच्छा गुरु जीवन में सही मार्ग पर चल कर सफलता हासिल करने के साथ-साथ जीवन को सत्य और अहिंसा से जीने के ढंग को सिखाता है। एक गुरु और शिष्य का रिश्ता सबसे अलग होता है।

गुरु चाहें तो अपने ज्ञान से पत्थर को भी सोना बना सकता है। कुछ हिन्दू ग्रंथों में ईश्वर का स्थान माता पिता के सामान बताया गया है। गुरु शिष्य के इसी सम्मानित रिश्तें को हर साल गुरु पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है। 

यह पर्व भारत समेत नेपाल और भूटान में भी हिन्दू, जैन और बोद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व हिन्दू, बोद्ध और जैन अपने आध्यात्मिक शिक्षकों, अधिनायकों के सम्मान और उन्हें अपनी कृतज्ञता दिखाने के रूप में मनाया जाता है।

इस अवसर पर शिष्य अपने गुरुओं के लिए तरह-तरह के आयोजन करते हैं और उन्हें गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं (Guru Purnima ki Hardik Shubhkamnaye) और गुरु पूर्णिमा कोट्स (Guru Purnima Quotes in Hindi) सेंड कर के उनका आशीर्वाद लेते हैं। आप भी चाहें तो अपने गुरुओं के लिए दो या गुरु पूर्णिमा पर सुविचार भेज कर उनका दिन खास बना सकते हैं। 

अगर भारतीय इतिहास की ओर नजर डालें तो गुरु पूर्णिमा को महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरू श्रीमद राजचन्द्र सम्मान देने के लिए पुनर्जीवित किया। उन्होनें सबको गुरु पूर्णिमा का इतिहास बताया और गुरु के सामान में मनाये जाने वाले इस दिन की महत्वता समझायी। तो चलिए जानते हैं गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है और इस दिन से जुड़ी सभी जानकारी। 

गुरु पूर्णिमा का महत्व?

“अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः ” यानी सद्गुरु की कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है और  गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। साल में केवल एक दिन नहीं बल्कि हर दिन अपने गुरुओं की बात सुनें और उनका सम्मान करें। शास्त्रों में गु का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ है- उसका निरोधक। इसलिए गुरु को अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले कहा जाता है।

गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है 

गुरु पूर्णिमा का विशेष पर्व महार्षि वेद व्यास के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। महार्षि वेद व्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे, जिन्हें शास्त्र के साथ-साथ  तीनों कालों का ज्ञान था। वह एक महान ज्ञानी पंडित थे।

महऋषि वेद व्यास ने सदैव अपने शिष्यों को जीवन नए ढंग से नए तरीके से जीने का तरीका सिखाया। इसी कारण से हर साल महार्षि वेद व्यास के जन्मदिवस पर आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

कुछ किवदंतियों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बराबर माना गया है। साल 2021 में गुरु पूर्णिमा का पर्व 24 जुलाई को पड़ेगा। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर छात्र अपने गुरुओं के चरण स्पर्श करते हैं और हमेशा उनके दिखाए मार्ग पर चलने का प्रण लेते हैं। कुछ शिष्य इस दिन अपने गुरुओं को उपहार भी देते हैं।

वेद, उपनिषद और पुराणों के अनुसार महर्षि वेदव्यास को समस्त मानव जाति का गुरु बताया गया है। महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को करीब तीन हजार ईसा पूर्व में हुआ था। मगर कुछ इतिहासकारों और ज्ञानी पंडितों के अनुसार भगवान शिव सबसे पहले गुरु माने जाते हैं। जिनके सबसे पहले दो शिष्य शनि और परशुराम जी थे।

ऐसा माना जाता हैं भगवान शिव ने ही पृथ्वी पर धर्म का प्रचार-प्रसार किया। आपको जान कर हैरानी होगी कि गुरु पूर्णिमा जिसे आषाढ़ मास की पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। इन चार महीने मौसम सबसे अच्छा होता   हैं, इसलिए यह अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं।

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